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नेपाल में हंगामा है क्यों बरपा…?

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नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड की तीन दिवसीय यात्रा का आज अंतिम दिन है। रविवार 28 मई को जब देश के नए संसद का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया और संसद की भित्ति चित्र दुनिया के सामने आया, तो नेपाल में हड़कंप मच गया। संसद में लगे भित्ति चित्र में लुंबिनी और कपिलवस्तु को दिखाया गया है। वैसे तो उस भित्ति चित्र में पाकिस्तान का कुछ हिस्सा भी दिखाया गया है। 31 मई को जब नेपाल के पीएम भारत के लिए रवाना हो रहे थे, तो नेपाल के विपक्षी दलों सहित उनके ही दल के नेताओं ने उन पर दबाव डाला था कि वे इस भित्ति चित्र को लेकर भारत के सामने विरोध प्रकट करें। अभी तक तो कोई ऐसी खबर भारतीय मीडिया में नहीं दिखी है जिसमें उनके विरोध प्रकट करने की बात कही गई हो।

 नेपाल का विरोध इस बात को लेकर है कि भारत ने अखंड भारत के नक्शे में लुंबिनी और कपिलवस्तु को क्यों डाला गया। लुंबिनी और कपिलवस्तु कभी भारत का हिस्सा नहीं रहे हैं। नेपाल के सोशल मीडिया पर यह मुद्दा छाया हुआ है। नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में करीब 40 साल तक इतिहास पढ़ाने वाले प्रोफेसर त्रिरत्न मानंधर का कहना है कि भारत किस आधार पर अखंड भारत की बात करता है। यदि भारत अखंड भारत की बात कर सकता है, तो हम भी अखंड नेपाल की बात कर सकते हैं। वे इसका ऐतिहासिक आधार भी बताते हैं। उनका कहना है कि समुद्र गुप्त के एक अभिलेख में लिखा हुआ है कि नेपाल नाम का देश कामरूप (वर्तमान असम) और कीर्तिपुर (उत्तराखंड का कुमायुं गढ़वाल) के बीच बसा हुआ है।

इस तरह तो नेपाल का बहुत बड़ा भाग भारत में समाहित है। त्रिरत्न मानंधर तो और भी उदाहरण पेश करते हैं जिसके अनुसार दार्जिलिंग पर भी नेपाल का दावा बनता है। लेकिन नेपाल का यह दावा या विरोध निरर्थक है। भारत ने अपने नए संसद में सिर्फ भित्ति चित्र बनाया जरूर है, लेकिन लुंबिनी या कपिलवस्तु पर कभी अपना दावा तो नहीं ठोका है। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि वर्तमान पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक भारतीय साम्राज्यों का विस्तार रहा है। ईसा पूर्व और उसके बाद कई राजाओं ने अफगानिस्तान तक को अपने पराक्रम से जीत रखा था। भारतीय सभ्यता का विस्तार तो थाईलैंड, कंबोडिया, मारीशस आदि देशों में भी रहा है। वहां आज भी काफी संख्या में भारतीय बसे हुए हैं।

वे उन देशों की अर्थव्यवस्था में अच्छी खासी भागीदारी निभा रहे हैं, तो इसका यह मतलब नहीं है कि भारत ने उन पर अपना दावा ठोक रखा है। हां, आरएसएस के वरिष्ठ नेता से लेकर कार्यकर्ता तक अखंड भारत की बात जरूर करते हैं, लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, वह सांस्कृतिक है, राजनीतिक या भौगोलिक नहीं है। किसी ने अति उत्साह में आकर ऐसी कोई बात कही हो, तो भी उसका कोई मतलब नहीं है। जब तक भारत सरकार का कोई आधिकारिक बयान नहीं आ जाता है। नेपाल को फिजूल का वितंडा खड़ा करने से बचना चाहिए।

संजय मग्गू

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