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सब एक ईश्वर की संतान तो भेदभाव क्यों?

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बोधिवृक्ष
अशोक मिश्र
संत तुकाराम का जन्म 1608 में पुणे के देहू गांव में हुआ था। संत तुकाराम मराठी भाषा के कवि भी थे। उन्होंने अभंग की रचना की थी। उन दिनों महाराष्ट्र में छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई बहुत गहरे तक अपनी जड़ें जमा चुकी थी। वैसे तो यह बुराई पूरे देश में किसी न किसी रूप में व्याप्त थी। लोग अछूतों से बात करना तक पसंद नहीं करते थे। वहीं संत तुकाराम मानते थे कि सभी मनुष्य एक ईश्वर की संतान हैं। ऐसी स्थिति में किसी भेदभाव करना उचित नहीं है। हालांकि अपने समय में संत तुकाराम महाराष्ट्र में व्याप्त जाति और वर्ण व्यवस्था को खत्म तो नहीं कर पाए, लेकिन उसमें लचीलापन लाने में जरूर सफल हुए थे। एक बार की बात है। वह अपने गांव देहू से कहीं जा रहे थे। गांव से काफी दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति पेट दर्द से कराह रहा है। लोग उस रास्ते से आ जा रहे थे, लेकिन कोई भी उसके पास नहीं जा रहा था। यह देखकर संत तुकाराम को बहुत बुरा लगा। वह उस व्यक्ति के पास गए, तो उस व्यक्ति ने दर्द से कराहते हुए बताया कि वह नीची जाति का है। उसके पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है और उसने तीन दिन से कुछ खाया-पिया नहीं है। यह सुनकर संत तुकाराम का दिल करुणा से भर गया। वह उस व्यक्ति को किसी तरह सहारा देकर अपने घर लाए और उसे साफ पानी पीने को दिया। उसे खाना खिलाया और कुछ दिनों तक उसकी जमकर सेवा की। कुछ ही दिनों बाद वह व्यक्ति स्वस्थ हो गया। इस बीच गांववालों को पता चला कि तुकाराम नीची जाति वाले को अपने घर लाए हैं, तो उन्होंने विरोध किया। तब संत ने कहा कि हम सभी लोग एक ही ईश्वर की संतान हैं। ऐसे में ऊंच-नीच का भेद क्यों करना चाहिए। यह सुनकर गांववालों को बात समझ में आ गई।

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