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कांग्रेस के अलावा दूसरी दलोंं में कितने दिन टिकेंगे थरूर?

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आकाश सिंह
केरल के तिरुवनंतपुरम के कांग्रेस सांसद शशि थरूर इन दिनों काफी चर्चा में हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि वह भाजपा में जा रहे हैं। उनके कांग्रेस से अच्छे संबंध नहीं चल रहे हैं। शशि का स्वागत करने के लिए वैसे तो भाजपा भी आतुर दिखाई देती हैं, केरल की सत्तारूढ़ पार्टी सीपीएम भी बाहें पसारे है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाजपा या सीपीएम उनकी बेबाकी को, प्रगतिशीलता को, उनकी हर मामले में अपनी राय व्यक्त करने की आदत को स्वीकार कर पाएगी? जिस राजनीतिक दल में सब कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही तय करते हों, उनके सामने किसी को खड़े होने की इजाजत नहीं हो, पीएमओ ही सभी नेताओं की लाइन और लेंथ तय करता हो, उस पार्टी में क्या शशि थरूर जैसे लोग ज्यादा दिन रह पाएंगे? शायद नहीं। सीपीएम भी उन्हें यदि अपने में समाहित कर लेती है, तो ज्यादा दिन शशि थरूर वहां भी नहीं टिक पाएंगे। सीपीएम में सब कुछ केंद्रीय कमेटी ही तय करती है, उसके अनुरूप चलना और बोलना होता है। यदि तनिक भी इधर उधर हुए तो पार्टी अकुला जाती है, बेचैन हो जाती है। पार्टी सिद्धांत को धक्का लगने लगता है। यहां भी शशि थरूर कितने दिन टिक पाएंगे, यह देखने वाली बात होती है। (यदि थरूर कांग्रेस को छोड़ते हैं और सीपीएम ज्वाइन करते हो तो)
यह कांग्रेस ही है, खुलेआम कांग्रेस की आलोचना करने वाले शशि थरूर को स्वीकार करती है और चुनाव से ठीक  पहले विवादास्पद बयान देकर भाजपा को जिता देने वाले दिग्विजय सिंह, सैम पित्रोदा, गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी को नीच बताकर कांग्रेस का माहौल बिगाड़ देने वाले मणिशंकर अय्यर और मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हाशिये पर लाने वाले कमलनाथ और नकुलनाथ जैसे पिता-पुत्र को गले से लगाए रहती है। इतनी सारी अराजकता की हद तक पहुंच जाने वाली स्वतंत्रता सिर्फकांग्रेस में ही नेताओं को मिल सकती है।
हरियाणा कांग्रेस को ही लीजिए। यह विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस की हवा बह रही थी। लोगों को लगता था कि जनता कांग्रेस को सत्ता सौंपने को तैयार है, लेकिन कांग्रेसी ही सत्ता पर बैठने को तैयार नहीं हैं। चुनाव के तारीख की घोषणा से ही बहुत पहले यहां सुरजेवाला, सैलजा और हुड्डा गुट भाजपा से निपटने की बजाय एक दूसरे से निपटने में लगे हुए थे। भाजपा पर आरोपों-प्रत्यारोपों की तीर छोड़ने की जगह एक दूसरे के खिलाफ आरोपों की मिसाइलें छोड़ी जा रही थीं। मैं बनूंगा मुख्यमंत्री का भजन तीनों गुट खड़ताल पर गाए जा रहे थे। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस हार गई। कांग्रेस हाईकमान ने हरियाणा के इन लड़ाकू नेताओं को कुछ कहा। कुछ नहीं कहा। भला इतनी स्वतंत्रता शशि थरूर को किसी भी दल में मिल सकती है। कतई नहीं।
ऐसा नहीं लगता है कि शशि थरूर कांग्रेस को छोड़ेंगे। वह तो केरल कांग्रेस में काम करना चाहते हैं, कोई जिम्मेदारी चाहते हैं ताकि वह अपने कांग्रेसी होने का दायित्व निभा सकें। थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि वह कांग्रेस को छोड़ देंगे, तो वह किसी पार्टी में जाने की जगह अपने दूसरे काम करेंगे। थरूर विद्वान आदमी हैं। संयुक्त राष्ट्र की नौकरी छोड़कर सन 2009 में कांग्रेस में आए थे। बुद्धिजीवी हैं। अर्थशास्त्र और विदेशनीति के बारे में अच्छी जानकारी है। उन्हें जो कुछ भी सही लगता है, उस पर वह खुलकर बोलते हैं। पार्टी लाइन पर भी और पार्टी लाइन के विपरीत जाकर भी। वह अपने को रोक नहीं पाते हैं। उनका बस यही दोष है। यह सही है कि इन दिनों वह कांग्रेस हाईकमान से नाराज चल रहे हैं। कारण यह है कि कांग्रेस पार्टी उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दे रही है। वह काम करना चाहते हैं। केरल में वह कुछ करके दिखाना चाहते हैं। बस, उनकी छटपटाहट यही है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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