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एक तरह से बचपन जैसा ही होता है बुढ़ापा

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बुढ़ापा मनुष्य की वह अवस्था है जब यह लगने लगता है कि हाय.. अब सब कुछ छूट रहा है। यह जीवन, यह खुशी, यह दुख, यह परिवार, जीवन भर में ईमानदारी या बेईमानी से कमाई गई संपत्ति यहीं छूट जाएगी। एक अजीब किस्म का मोह या विरक्ति मनुष्य पर हावी होने लगती है। जैसे ही मनुष्य को यह एहसास होता है कि बस, इस खूबसूरत दुनिया में कुछ ही दिन बचे हैं, तो अलग-अलग लोगों में सिर्फ दो तरह की ही भावनाएं पैदा होती है। एक मोह और दूसरी विरक्ति। जिन्होंने जीवन में सारे सुख उठाएं हैं, उनको या तो सुख छूटने का अफसोस होने लगता है या फिर विरक्त हो जाते हैं। वे लोग जिन्होंने अपना जीवन जिद्दी की तरह बिताया है, उनमें से ज्यादातर लोग अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी स्वभाव को बदल नहीं पाते हैं। नतीजा यह होता है कि घर में क्लेश और विवाद पैदा होता है।

उनकी देखभाल करने वाले भी परेशान रहते हैं। वे न तो खुद चैन से जीते हैं और न ही परिवार वालों को चैन से रहने देते हैं। पुराने समय में जब संयुक्त परिवार हुआ करते थे, तो लोग किसी तरह उन्हें सम्मान देते हुए उनकी देखभाल किया करते थे। वह उनकी ज्यादती भी सहन कर लिया करते थे। संयुक्त परिवार में लोगों की संख्या ज्यादा होने की वजह से उनका जिद्दीपन भी एक ही आदमी को झेलना नहीं पड़ता था। तब समाज का भी एक भय रहता था कि गांव या मोहल्ले के लोग क्या कहेंगे? नाते-रिश्तेदार क्या कहेंगे? समाज के दबाव में लोग अपने बुजुर्ग का जिद्दीपन और क्रोध सहन कर जाते थे। इसके पीछे संपत्ति का लालच भी काम करता था। यदि बुजुर्ग ने खुद संपत्ति कमा रखी है, तो वह किसी दूसरे को न दे दे, इस भय से भी लोग बुजुर्ग की सेवा सुश्रुषा किया करते थे।

असल में जो लोग क्रोधी होते हैं, वे बुढ़ापे में जिद्दी व्यक्ति की बनस्पित कम तकलीफ देते हैं। व्यक्ति में क्रोध का आवेग क्षणिक होता है, लेकिन जिद्दीपन स्थायी भाव लिए रहता है। सबसे बढ़िया बुढ़ापा उन लोगों का बीतता है, जो बुढ़ापे में सब चीजों से विरक्त हो जाते हैं। उन्हें जो मिल गया, वह खा लिया। जो पहनने को मिल गया, वह पहन लिया। किसी से कोई गिला नहीं, कोई शिकवा नहीं। संतोष का भाव स्थायी हो जाता है क्योंकि वह जान चुका होता है कि अब उसके दिन खत्म हो गए। वह कुछ ही सालों का मेहमान है। ऐसी स्थिति में वह धार्मिक भी हो जाता है। यह धार्मिकता उसे मौत के भय को काफी हद तक कम भी कर देती है।

अगर यह कहा जाए कि बुढ़ापे में व्यक्ति को अपने जीवन के संघर्ष पूर्ण और सुख से बीतने वाले दिन बहुत याद आते हैं। कई लोग अपने संघर्ष पूर्ण दिनों को याद करके अवसाद में भी चले जाते हैं। वहीं जो लोग अपने सुखमय दिनों को याद करते हैं, उनका बुढ़ापा बड़े मजे बीत जाता है। इन सब बातों के बावजूद हमारा सबसे पहला कर्तव्य यही है कि हम अपने बुजुर्गों का सम्मान करें। उनका स्वभाव भले ही कैसा भी हो। बुढ़ापा भी एक तरह से बचपन जैसा होता है।

-संजय मग्गू

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