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HomeEDITORIAL News in Hindiसंत महल में रहकर भी अनासक्त होते हैं

संत महल में रहकर भी अनासक्त होते हैं

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परमार राजवंश के राजा थे भोज। उनका शासनकाल सन 1010 से 1055 तक माना जाता है। कहा जाता है कि मालवा क्षेत्र में उन्होंने भोजपुर नगर बसाया था जिसे भोजपाल कहा जाता था। यही भोजपाल नगर आज भोपाल के नाम से मशहूर है और मध्य प्रदेश की राजधानी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार राजा भोज की कई रानियां थीं जिसमें लीलावती और पद्मावती प्रमुख थीं। लीलावती अत्यंत विदुषी महिला थीं। राजा भोज खुद अत्यंत विद्वान थे। कहा जाता है कि अपने राज्य में रहने वाले एक संत पर उनकी अगाध श्रद्धा थी। राजा भोज ने उनके लिए अपने ही समान एक भव्य महल बनवाया और सारी सुख सुविधाओं की व्यवस्था की। एक दिन वह उस संत के पास गए और उनसे आग्रह किया कि वह चलकर उस महल में रहें। संत ने उनकी बात मान ली और उस महल में रहने लगे। कुछ दिन बीत गए।

एक दिन राजा भोज ने प्रात:काल उपवन में सैर करते समय संत से पूछा-आपमें और मुझ में क्या अंतर है? अब तो हम दोनों एक समान सुख-सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। संत ने राजा भोज से कहा कि कुछ दिन बाद आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा। कुछ दिन और बीते। एक दिन संत और राजा भोज घूमते-घूमते वन में पहुंच गए। तब संत ने कहा कि अब महल में रहना बहुत हो गया। चलो, हम दोनों सब कुछ छोड़कर वन में ही रहते हैं।

तब राजा भोज ने कहा कि मैं कैसे सब कुछ छोड़कर वन में रह सकता हूं। मेरी पत्नी है, बच्चे हैं, इतना बड़ा राज्य है। राज्य के प्रति मेरा दायित्व है। तब संत ने हंसते हुए कहा कि मुझमें और आप में यही अंतर है। एक महल में रहते हुए भी अनासक्त है और दूसरा वन में रहते हुए आसक्त है। इतना कहकर संत वन में चले गए।

-अशोक मिश्र

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