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फोर फ्लोर: पहले थोपी गई, अब बिल्डरों के दबाव में फिर मंजूरी की तैयारी

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सरकार द्वारा थोपी गई पॉलिसी का खामियाजा शहर के लोग उठाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। सरकार ने परिवारों के बढ़ने का तर्क देते हुए शहर में स्टिल्ट पार्किंग के साथ चार मंजिला मकान बनाने की अनुमति दी थी। लेकिन अनुमति देने से पहले सरकार ने न तो इस संबंध में कोई सर्वे अथवा अध्यन करवाया और न ही नगर निगम के पास मौजूद संसाधनों के संबंधों में कोई जानकारी हासिल की थी।और न सरकार ने नगर निगम के संसाधनों में इजाफा करने के लिए कोई बजट दिया। इससे जहां पहले से बसे शहर का स्वरूप बिगड़ गया, वहीं लोगों की परेशानी भी बढ़ गई।इस पॉलिसी का फायदा आम लोगों की बजाए बिल्डरों ने जमकर उठाया है। पिछले दिनों लोगों की शिकायत के बाद सीएम ने अस्थाई रोक लगा दी थी। लेकिन अब सरकार द्वारा गठित कमेटी इस रोक को हटाने के लिए लोगों की राय ले रही है। बिल्डर इस पॉलिसी की मंजूरी के लिए दबाव तो नहीं बना रहे?

लोगों ने पॉलिसी को नकार दिया

सरकार ने फिलहाल चार मंजिला मकानों के निर्माण पर रोक लगाते हुए स्टिल्ट पार्किंग के साथ तीन मंजिला मकान बनाने की अनुमति दी हुई है। रोक लगाते समय सरकार ने इस पॉलिसी को फिर से लागू करने के लिए कमेटी का गठन किया था। लोगों की राय लेने के लिए एक्सपर्ट कमेटी के अध्यक्ष पी राघवेंद्र राव ने शुक्रवार को शहर की आरडब्ल्युए, ग्रेटर फरीदाबाद की आरडब्ल्युए और इंस्ट्टियूट आॅफ आर्किटेक्ट के प्रतिनिधियों की राय लेने के बैठक बुलाई थी। जिसमें तीनों ही संस्थाओं ने इस पॉलिसी को सीरे नकार दिया है। उनका कहना था कि इस पॉलिसी को पुराने सेक्टरों और अन्य रिहायशी इलाकों में लागू न किया जाए। नए बसाए जाने वाले सेक्टरों में इसे लागू किया जा सकता है। क्योंकि पुराने रिहायशी इलाकों में चार मंजिला इमारतें बनने सेसाथ लगते मकानों में दरारें आ रही हैं।

बिना सर्वे के थोपी थी पॉलिसी

शहर में चारों और चार से छह मंजिला फ्लैटों के हो रहे निर्माण के कारण   स्थिति बदतर होते देखकर सामाजिक कार्यकर्ता तरूण चौपड़ा ने इस संबंध डीटीपी विभाग में एक आरटीआइ दायर की थी। जिसमें उन्होंने विभाग से सवाल किया था कि सेनिक कालोनी में स्टिल्ट पार्किंग के साथ चार मंजिला फ्लैटों के निर्माण की अनुमति देने से पहले क्या मौके का अध्यन करवाया है। क्या विभाग की तरफ से पॉलिसी के संबंध कोई सर्वे करवाया गया है। जिसके जबाव में विभाग ने स्पष्ट कहा था कि उन्होंने अनुमति देने से पहले न तो कोई अध्यन किया और न किसी तरह का सर्वे करवाया है। तरूण चौपड़ा का कहना है कि नियमों के मुताबिक आम लोगों के हितों से जुड़ा कोई भी फैसला करने से पहले सरकार अथवा विभाग को सर्वे जरूर करवाना चाहिए था।

नियमों की उड़ाई धज्जियां

सरकार ने स्टिल्ट पार्किंग के साथ चार मंजिला फ्लैट बनाने की अनुमति दी थी। लेकिन बिल्डरों ने सरकार द्वारा बनाए गए बिल्डिंग बाय लॉज को पूरी तरह ताक पर रख दिया। एनआइटी इलाके में बनी ज्यादातर इमारतों में स्टिल्ट पार्किंग की जगह दुकानें बनाई गई हैं।इसके अलावा कुछ इलाकों में बिल्डरों ने शुरू में दिखाने के लिए स्टिल्ट पार्किंग बना तो दी। लेकिन बाद में पार्किंग की  जगह में चूहा फ्लैट बनाकर बेच दिये। इतना ही नहीं एनआइटी इलाके में तो 180 वर्ग गज जगह में बिल्डरों ने चारकी बजाए आठ आठ फ्लैट भी बनाए हुए हैं। बिल्डरों ने पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करते हुए ग्रीन बेल्टरों पर सड़क तक पक्के रैम्प का निर्माण किया हुआ है। जिससे बरसाती पानी जमीन को रिचार्ज नहीं कर पाता। बिल्डरों की इस लापरवाही के कारणों से  शहर का भूजल स्तर लगातार  गिरता जा रहा है।

मिली भगत के बिना सम्भव नहीं है

समाज सेवी विष्णु गोयल का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी सिर्फ नोटिस देने की खानापूर्ति करने तक ही समिति रहते हैं। नोटिस देने के बाद अवैध इमारतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। शहर में इतने बड़े पैमाने पर हो चुके अथवा हो रहे अवैध निर्माण निगम अधिकारियों और  बिल्डरों की मिली भगत के बिना किसी भी सूरत में सम्भव नहीं है।

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