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बोधिवृक्ष: महात्मा गांधी और टैगोर में मतभेद

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हमारे देश के स्वाधीनता संग्राम बहुत सारे लोगों ने अपनी आहुति दी थी। इस दौरान कुछ राजनीतिक संगठन भी बने जिन्होंने आजादी की लड़ाई की अगुआई की। कांग्रेस इसमें प्रमुख थी। इसके सर्वमान्य नेता थे मोहनदास करमचंद गांधी। गांधी जी अहिंसा के समर्थक थे। वहीं रवींद्रनाथ टैगोर भी अपनी लेखनी के माध्यम से लोगों में जन जागृति कर रहे थे। लेकिन कहा जाता है कि महात्मा गांधी और रवींद्र नाथ टैगोर में वैचारिक मतभेद थे। कई मुद्दों पर टैगोर महात्मा गांधी से सहमत नहीं होते थे, तो वह खुलकर विरोध करते थे। वह गांधी जी के फैसलों को प्रभावित करने का प्रयास भी करते थे, लेकिन वह गांधी जी का अनादर नहीं करते थे। निजी और सार्वजनिक जीवन में वह गांधी की आलोचना करते हुए भी उनके मान सम्मान का पूरा ख्याल रखते थे। एक बार की बात है। गांधी जी शांति निकेतन आए, तो वहां पढ़ने वाली एक छात्रा ने गांधी जी से आटोग्राफ मांगा।

गांधी से उस छात्रा के अनुरोध को अस्वीकार नहीं कर सके। उन्होंने उसकी नोटबुक में लिखा कि जीवन में जब किसी व्यक्ति से कोई वायदा करो, तो उसे हर हालत में पूरा करने का प्रयास करो। अपने वायदे से मुकरना कतई उचित नहीं है। जब रवींद्र नाथ टैगोर को यह बात पता चली तो उन्होंने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि गांधी जी ने क्या लिखा है। उस नोट बुक पर गांधी जी की लिखी बात से टैगोर चकित रह गए।

उन्होंने उस छात्रा की नोटबुक में अपनी ओर से कविता की दो पंक्तियां लिखीं। आखिरी लाइन उन्होंने अंग्रेजी में लिखी कि जब तुम्हें पता  लगे कि तुमने गलत वायदा किया है, तो उसे तोड़ दो। वैसे कुछ लोगों का यह भी कहना है कि गांधी जी और टैगोर में कई बार अबोला हो जाता था। यह बात कितनी सही है, यह नहीं कहा जा सकता है। कई बार छोटी-छोटी बातों को लोग बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं।

अशोक मिश्र

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