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रेल विकास के कैसे-कैसे दावे, पर कितने निकले सच्चे?

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भारतीय रेल के इतिहास में गत 2 जून की शाम ओडिशा के बालासोर में हुआ भीषण ट्रेन हादसा अब तक देश में हुए भयंकरतम ट्रेन हादसों के रूप में अपना नाम दर्ज करा गया। लगभग 300 लोगों की जान लेने और लगभग 900 लोगों को घायल कर देने वाले इस रेल हादसे के अगले ही दिन ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस भीषण दुर्घटना के मद्देनजर एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सहित अनेक मंत्रियों, उच्चाधिकारियों ने दुर्घटनास्थल का दौरा किया। दुर्घटना की जांच लापरवाही, यांत्रिक खामियां या साजिश का नतीजा थीं, इन सभी कोणों से की जा रही है। इस दुर्घटना के बाद सरकार की खूब आलोचना भी हो रही है। निश्चित रूप से विपक्ष को इस भीषण ट्रेन हादसे के रूप में एक मुद्दा भी हाथ लग गया है। इतिहास के पिछले पन्ने पलटने पर यकीन रखने वाली इस सरकार को लोग रेल इतिहास की वह दुर्घटना भी याद दिला रहे हैं जिसके बाद तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी खुद पर लेते हुये मंत्री पद से त्याग पात्र दे दिया था।                                  

पिछले कुछ समय से वर्तमान सरकार रेल संबंधी विकास कार्यों को भी कुछ उसी अंदाज में पेश कर रही थी गोया रेल विकास भी भारत में अब मोदी काल में ही होना शुरू हुआ है। एक एक वंदे भारत ट्रेन को प्रधानमंत्री स्वयं झंडी दिखाकर रवाना कर रहे हैं और ऐसे प्रत्येक अवसर पर रेल विकास की महिमा का बखान किया जाता है। जिस देश में दशकों से राजधानी, शताब्दी, संपर्क क्रांति, दूरंतो, तेजस जैसी 130 से लेकर 150 किमी/घंटा की गति से दौड़ने वाली ट्रेन्स की सीरीज सफलता से चल रही हो और देश के यात्रियों को अपनी सेवाएं देती आ रही हों, वहाँ वन्दे भारत को सबसे तेज और आधुनिक बताकर पिछली सरकारों की उपलब्धियों को धुंधला करने की कोशिश की जाती है। पैसेंजर ट्रेन्स को मेल बताकर जनता से तीन गुना किराया वसूल कर और वरिष्ठ नागरिकों को किराये में मिलने वाली छूट समाप्त कर रेल कमाई में इजाफे का ढोल पीटा जाता है।

वंदे भारत एक्सप्रेस के बारे में बताया गया है कि यह देश की सबसे तेज गति वाली ट्रेन है। इसकी गति सीमा 160/180 किलोमीटर प्रति घंटे है। और भविष्य में इसके 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से भी दौड़ने की योजना है। अब जरा रेल ट्रैक की हकीकत देखें तो यही वंदे भारत एक्सप्रेस मथुरा में तीसरे ट्रायल में ही नीलगाय से टकरा गयी थी। इसके बाद वंदे भारत गुजरात के अतुल रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन के सामने बैल आ जाने से टक्करा गयी। इससे ट्रेन का आगे का हिस्सा टूट गया था। यही तीव्र गति वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन गांधीनगर से जाते समय वडोदरा सेक्शन में आनंद स्टेशन के पास ट्रेन के आगे गाय आने से टकरा गयी।

उसी तरह एक बार वंदेभारत अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के पास भैंसों के झुंड से टकरा गयी थी। इस हादसे में चार भैंसों की मौत हो गई थी और  ट्रेन का सामने का हिस्सा टूट गया था। दिल्ली से वाराणसी जा रही वंदे भारत एक्सप्रेस में एक बार तकनीकी त्रुटि आने के बाद ट्रेन के पहिए जाम हो गए थे। तब ट्रेन लगभग पांच घंटे खुर्जा स्टेशन पर रुकी रही। बाद में यात्रियों को शताब्दी एक्सप्रेस से उनके गंतव्य तक भेजा गया। क्या वंदे भारत के रेल ट्रैक को पूर्ण सुरक्षित रेल ट्रैक कहा जा सकता है?

उधर वंदे भारत से भी आगे बढ़कर देश तीव्रगामी बुलेट ट्रेन की भी प्रतीक्षा कर रहा है। जापानी प्रधानमंत्री के साथ तीव्रगामी बुलेट ट्रेन के ‘समझौता शो’ को भी देश देख ही चुका है। इन परिस्थितियों में सबसे अहम सवाल यह है कि जब देश की अधिकांश रेल लाइनें खुली हुई हैं। जहां हाथी, गाय, भैंस और अन्य जानवर आये दिन कट कर मरते हों व ट्रेन को भी नुक़्सान पहुंचते हों। जहां पूरी की पूरी रेल लाइन चोरी हो जाने की खबरें आती हों। जहाँ नक्सलवादी व अन्य लुटेरे लोग ट्रेन में डकैतियां डाल सकते हों व रेल लाइन को क्षतिग्रस्त कर सकते हों। जहां रोजाना जहर खुरानी की घटना के शिकार सैकड़ों यात्री होते हों। जहाँ तमाम स्टेशंस पर पीने का पानी समुचित रूप से उपलब्ध न हो और कहीं बिना टोंटी के बहता दिखाई दे, जहां बाबा और भिखारी का रूप धारण कर लाखों लोग ट्रेन में मुफ़्त यात्रा कर टिकटधारी यात्रियों के लिए मुसीबत खड़ी करते हों, जहां अनेक व्यस्ततम दूरगामी सामान्य ट्रनों में कुली, पैसेंजर्स को खिड़की में बोरी की तरह घुसेड़ने के बदले सैकड़ों रुपये वसूलते हों। जहाँ के तमाम स्टेशंस भिखारियों, जुआड़ियों, चोर, पॉकेटमार और नशेड़ियों के अड्डे बन चुके हों, जहाँ ट्रेन्स में यात्रियों व उनके सामान की सुरक्षा सुनिश्चित न हो, ऐसी रेल व्यवस्था में शत प्रतिशत सुरक्षित ट्रेन परिचालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

लिहाजा रेल विभाग की प्राथमिकता बुलेट ट्रेन या वंदे भारत में बढ़ोतरी की नहीं बल्कि वर्तमान रेल परिचालन व्यवस्था में सम्पूर्ण सुधार होना चाहिये। यह सुधार रेलवे के सभी क्षेत्रों में होना चाहिए। वर्तमान ट्रेन्स में यात्रियों की सुरक्षा व ट्रेंस का पूर्ण सुरक्षित परिचालन सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। देश की बड़ी आबादी बुलेट ट्रेन या वंदे भारत में नहीं, बल्कि अन्य मेल एक्सप्रेस व यात्री ट्रेन्स में चलती है। जब वर्तमान ट्रैक पूर्ण सुरक्षित हो जायेंगे, स्टेशंस सर्व सुविधायुक्त व असामाजिक तत्वों के चंगुल से मुक्त होंगे, तो वंदे भारत से भी तीव्र गति की ट्रेन भी इन पर दौड़ सकेगी। नि:संदेह ओडिशा के बालासोर में हुआ दर्दनाक भीषण ट्रेन हादसा इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये पर्याप्त है कि रेल विकास के दावे कितने ही क्यों न हों परन्तु दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।

निर्मल रानी

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