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गलतियों से भी सीखते थे अल्बर्ट आइंस्टीन

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अल्बर्ट आइंस्टीन को सापेक्षता के सिद्धांत और द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। उनकी आधुनिक खोजों ने विकास की एक नई अवधारणा को जन्म दिया। वे महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। महात्मा गांधी के निधन पर उन्होंने कहा था कि आने वाली पीढ़ी इस बात को बड़ी मुश्किल से विश्वास करेगी कि इस धरती पर हांड मांस का एक देवता रहता था। उन्होंने जितने भी आविष्कार किए, उसके लिए उन्हें काफी सम्मान मिला। इतना सब कुछ होते हुए भी वह बहुत सादगी से रहना पसंद करते थे।

उनका मानना था कि जब हम गलती करते हैं, तो हमें उससे यह सीख मिलती है कि हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करने और लोगों का सामना करने की हिम्मत होनी चाहिए। वे इंसान द्वारा की गई गलतियों को कतई बुरा नहीं मानते थे। बात उस समय की है, जब वे जर्मनी छोड़कर अमेरिका आ चुके थे। तब तक उनकी ख्याति पूरी दुनिया में फैल चुकी थी। दुनिया भर के विश्वविद्यालयों ने उन्हें अपने यहां पढ़ाने के लिए आॅफर किया था।

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लेकिन उन्होंने अमेरिका के सबसे पुरानी प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य पसंद किया। उन्होंने अपने यहां अध्यापन कार्य का आॅफर देने लिए सबके प्रति आभार भी व्यक्त किया। जब वह प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में पहुंचे तो वहां के प्रशासनिक अधिकारी ने पूछा, आपको किन-किन उपकरणों की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि एक ब्लैक बोर्ड, चाक, एक पेंसिल और एक बड़ी सी टोकरी। बड़ी सी टोकरी की डिमांड सुनकर अधिकारी चकित रह गया कि वे इसका क्या करेंगे। तब आइंस्टीन ने हंसते हुए कहा कि मैं पढ़ाते समय गणना करूंगा और गणना करते समय गलतियां करूंगा, तो छोटी टोकरी रद्दी से जल्दी भर जाएगी, इसलिए बड़ी टोकरी चाहिए।

-अशोक मिश्र

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