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जीत के बाद भी बंगाल में दीदी को लग रहा है खतरा

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भले ही बीजेपी 2024 के लिए छोटे दलों को मिलाकर अपनी रणनीति तैयार करने में लगी हुई हो लेकिन पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में वो अपनी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई है। लेकिन फिर भी बीजेपी की इस हार को पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में पार्टी की मजबूत होती सियासी जमीन का संकेत माना जा रहा है।
ऐसा क्यों—

हिंसा और तमाम राजनीतिक आरोप-प्रत्‍यारोप के बावजूद पंचायत चुनाव में ममता दीदी की तृणमूल कांग्रेस ने अपनी जीत का परचम लहरा ही दिया। साल 2011 के बाद टीएमसी हर चुनाव में विजेता घोषित रही है। लेकिन साल 2019 के लोकसभा और उसके बाद हुए चुनाव में बीजेपी के बढ़ते जीत के ग्राफ को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चिंता बढ़ा दी है। साल 2018 के पंचायत चुनाव में टीएमसी ने लगभग 90 फ़ीसदी सीटों पर अपनी जीत का परचम लहराया था। लेकिन फिर भी साल 2019 लोकसभा चुनाव में टीएमसी मात्र 12 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। और शायद अब यही वजह है कि विधानसभा और पंचायत चुनाव में भारी जीत के बावजूद भी ममता दीदी साल 2024 में विपक्षी एकता की कवायद में शामिल हो गई है। क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करती और अगर अलग-अलग चुनाव लड़ती तो इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को होता।

साल 2019 में पश्चिम बंगाल की 39 सीटों पर बीजेपी पहले या दूसरे नंबर पर थी। अगर फिलहाल की स्थिति देखें तो वोट विभाजन का फायदा बीजेपी को ही मिलेगा। तभी तो कर्नाटक में कांग्रेस की जीत और लंबे वक्त से कांग्रेस से रार बनाए रखने वाली एकला चलो की नीति को अपनाने वाली ममता दीदी शायद यह समझ गई है कि बीजेपी को हराना है तो विपक्ष या यूं कहे कि कांग्रेस के साथ हाथ मिलाना ही पड़ेगा। अब भले ही कुछ वक्त से अधीर रंजन चौधरी और ममता दीदी की तकरार सबके सामने नजर आ रही है लेकिन फिर भी ममता दीदी कांग्रेस के साथ जा रही है तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि कांग्रेस आगामी वक्‍त में संभावित संगठन का फेरबदल भी कर सकती है और अधीर रंजन की जगह किसी दूसरे को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

नम्रता पुरोहित

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