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इंडिया गठबंधन सचमुच बिखर जाएगा?

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क्या सचमुच इंडिया गठबंधन बिखर जाएगा? जैसी कि सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर आशंका जाहिर की जा रही है। तीनों राज्यों में कांग्रेस की करारी शिकस्त के बाद इंडिया गठबंधन में दरार की बात कही जा रही है। छह दिसंबर को कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन में शामिल 28 दलों की बैठक बुलाई थी, लेकिन टीएमसी, सपा, जदयू और सीपीआईएम के रवैये के चलते इस महीने के तीसरे हफ्ते तक बुलाने की बात कही जा रही है।

इंडिया गठबंधन में शामिल जितने भी दलों ने तीनों राज्यों में कांग्रेस की हार पर प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने कांग्रेस की आलोचना तो की है, लेकिन गठबंधन से अलग होने की बात किसी ने नहीं कही है। यहां तक ममता बनर्जी ने भी कहा है कि यह जनता की नहीं कांग्रेस की हार है। उन्होंने यहां तक कहा कि विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन अगले साल आम चुनाव से पहले मिलकर काम करेगा और गलतियों को सुधारेगा।

असल में इंडिया गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों की कांग्रेस से नाराजगी है। सच भी यही है कि पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का रवैया एक अहंकारी जमींदार जैसा रहा। कांग्रेस नेताओं ने गठबंधन धर्म का तनिक भी पालन नहीं किया। कमलनाथ तो अहंकार में इतना चूर हो गए कि कह बैठे-छोड़ो अखिलेश-वखिलेश। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सदाशयता नहीं दिखाई।

वे अपनी जीत के प्रति इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने सहयोगियों को साथ लेना भी जरूरी नहीं समझा। नतीजा सबके सामने है। अब सब नाराज हैं। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अखिलेश सिंह यादव, उमर अब्दुल्ला, उद्धव ठाकरे से लेकर केरल के सीएम और सीपीएम नेता पिनाराई विजय तक अपनी नाराजगी वक्त कर चुके हैं। इन लोगों की नाराजगी के बीच यह सोचना कि इंडिया गठबंधन बिखर जाएगा, थोड़ी जल्दबाजी होगी। इंडिया गठबंधन के झंडे तले चुनाव लड़ना जितनी कांग्रेस की मजबूरी है, उतनी ही मजबूरी अन्य दलों की भी है।

यह विपक्ष के अस्तित्व का सवाल है। आगामी लोकसभा चुनाव ही वह आखिरी मौका है जब उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ने की बाध्यता है। यदि एकजुट होकर नहीं लड़े, तो विपक्ष इतना कमजोर हो जाएगा जिसका होना या न होना, एक जैसा होगा। इस बात को सभी समझते हैं। यही वजह है कि सन 1976-77 की तरह यदि अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाना है, तो एकजुट होना पड़ेगा। कांग्रेस को भी अब थोड़ा झुकना होगा। जल्दी से जल्दी सीटों के बंटवारे का मुद्दा सुलझाना होगा। नाराज लोगों को मनाने की जिम्मेदारी अब कांग्रेस की है। यदि अपने अहंकार के लिए माफी भी मांगनी पड़े, तो मांग लेनी चाहिए। लोकसभा चुनाव के दौरान परिणाम क्या होता है, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि सारा विपक्ष एक साथ लड़ता है या नहीं। परिणाम कुछ भी हो, एक साथ लड़ना जरूरी है।


-संजय मग्गू

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