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शहर के पार्को की जमीन पर अवैध कब्जे, फिर कैसे कम होगा प्रदूषण?

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शहर भर में निगम की बेश कीमती जमीनों पर तो लोगों ने कब्जे किये हुए ही हैं। साथ ही ज्यादातर पार्क भी अवैध कब्जों का शिकार हो चुके हैं। वहीं निगम द्वारा खुद भी शहर के पार्को में कम्युनिटी सेंटर और स्टाफ क्वार्टर तक बनाए हुए हैं। इन कम्युनिटी सेंटरों में होने वाले समारोह का शुल्क आरडब्ल्युए द्वारा वसूला जाता है। शहर के दर्जनों पार्को में विभिन्न तरह के निर्माण बने हुए हैं। जबकि निगम ने एनआइटी निवासी सिद्धार्थ नरूला द्वारा दायर की गई एक आरटीआई के जवाब में खुद स्वीकार किया है कि निगम द्वारा किसी भी संस्था को पार्क में किसी भी तरह का भवन बनाने के लिए कोई जमीन अलॉट नहीं की । निगम ने पार्को में उद्यान शाखा के कर्मचारियों के लिए क्वार्टर बनाने की बात से भी आरटीआइ के जवाब में इनकार कर दिया है। जबकि पार्को में बने क्वार्टरों में लोग रहते हैं। इससे अंदाजा लगा सकते है कि निगम शहर की बिगड़ी आबो हवा में सुधार लाने के लिए कितना गंभीर है।

पार्को में किसी को नहीं दी जमीन

सिद्धार्थ नरूला ने नगर निगम में एक आरटीआई दायर कर पूछा था कि एनएच एक, दो, तीन, पांच के पार्को में जिन संस्थाओं को भवन बनाने के लिए जगह अलॉट की है, उनकी लिस्ट दी जाए और एग्रीमेंट की प्रति दीजाए।इसके जवाब में निगम की उद्यान शाखा ने स्पष्ट कहा कि उनके द्वारा एनएच एक, दो, तीन और पांच के पार्को के किसी भाग को किसी सामाजिक एवं धार्मिक संस्था को अथवा अन्य किसी भी रूप में आवंटन नहीं किया गया है। जब कि शहर में स्थिति इससे बिल्कुल विपरित देखने को मिल रही है। एनआइटी के इन इलाकों में स्थित अनेक पार्को में विभिन्न तरह के भवन बने हुए देखे जा सकते हैं। कई पार्को की जमीन पर व्यवसायिक इमारतें और शिक्षण संस्थान तक चल रहे हैं। लेकिन नगर निगम को इस बारे में नहीं पता।

ट्यूबवैलों स्थिति भी नहीं पता

आरटीआई में पूछा गया है कि एनएच एक, दो, तीन और पांच के पार्को में कितने ट्यूबवैल हैं। इनमें से कितने ट्यूबवैलों के भवनों में माली अथवा अन्य कर्मचारी रहते हैं। यह भी पूछा गया था कि पार्को में लगे कितने ट्यूबवैल चालू हैं। लेकिन निगम की उद्यान शाखा ने इस सवाल का जवाब देने से साफ पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि यह सवाल सिविल विभाग से संबंधित है। बेशक ट्यूबवैल लगाने का काम सिविल विभाग का हो सकता है। लेकिन इन ट्यूबवैलों का इस्तेमाल तो उद्यान शाखा द्वारा ही पार्को की सिंचाई के लिए किया जाता है। लेकिन इसके बावजूद निगम की उद्यान शाखा को यह नहीं पता कि पार्को में कितने ट्यूबवैल है और उनमें से कितने ट्यूबवलै चालू  हालत में हैं। इससे साफ अंदाजा लगाए जा सकता है कि कर्मचारी काम कैसे करते होंगे।

निगम बोला पार्को में नहीं है क्वार्टर

इस आरटीआइ में पूछा था कि इलाके के पार्को में निगम के मालियों और अन्य कर्मचारियों के लिए कितने क्वार्टर है, उनका विवरण दिया जाए। जबाव में बताया कि उद्यान शाखा ने इलाके के किसी भी पार्क में कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था नहीं की है। वहीं उद्यान शाखा निगम के अन्य कर्मचारियों के संबंध में कुछ भी नहीं कहा है। जबकि इन इलाकों में स्थित अनेक पार्को में नगर निगम के ट्यूबवैलों के कमरे, स्टाफ क्वार्टर और अन्य कई तरह के भवन बने हुए हैं। इनमें से अनेक ट्यूबवैलों और स्टाफ क्वार्टरों में निगम कर्मचारियों के परिवार रहते हैं। कई पार्को में निगम कर्मचारियों खुद ही कच्चे पक्के मकान बनाकर परिवारों के साथ रह रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि नगर निगम की उद्यान शाखा को इस बारे में बिल्कुल भी पता ही नहीं है।

कई सवालों के नहीं दिये जवाब

सिद्धार्थ नरूला ने नगर निगम में दायर की इस आरटीआई के माध्यम से एनएच एक, दो, तीन और पांच में स्थित पार्को से संबंधित कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे थे। इनमें से ज्यादातर सवालों का तो नगर निगम के संबंधित अधिकारी ने करीब एक साल बाद भी जवाब देने की जरूरत महसूस नहीं की। आरटीआई में पार्को में करोड़ों रुपये की लागत से लगाए गए जिम, कनॉपी, झूले, फुव्बारे और वैंचों से संबंधित सवाल भी पूछे गए हैं। उद्यान शाखा ने इस संबंध में एनएच पांच की नर्सरी में स्थित कार्यालय में सम्पर्क करने को कह कर पल्ला झाड़ लिया है।

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