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लापरवाही या भ्रष्टाचार: ईकोग्रीन पर नगर निगम की इतनी मेहरबानी क्यों?

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राजेश दास

ईकोग्रीन कंपनी ने कूड़े से बिजली बनाने का वायदा किया था। लेकिन कूड़े से बिजली तो बना नहीं पाए बल्कि कंपनी ने बंधवाड़ी में कूड़े का पहाड़ जरूर खड़ा कर दिया। जिससे अरावली पर्वत के जंगलों और जीव जंतुओं को लगातार नुकसान हो रहा है। कंपनी द्वारा घरों से कूड़ा इक्ट्ठा करने के लिए नगर निगम के ही संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद कंपनी द्वारा लोगोंसे मन माना शुल्क वसूला जा रहा है। जब कि शहरी निकाय विभाग ने घरों से शुल्क वसूली के लिए दर निर्धारित किये हुए हैं। तय दरों के मुताबिक कंपनी 100 वर्ग गज तक के मकानों से 20 रुपये मासिक वसूल सकती हैं। लेकिन कंपनी 50 रुपये वसूल रही है। यदि मकान में एक से ज्यादा परिवार रहते हैं तो सभी से 50 रुपये की दर से अलग अलग शुल्क वसूला जा रहा है। जिससे लोगों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है। लेकिन शिकायत करने के बावजूद निगम अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाती।

एग्रीमेंट में तय किये थे शुल्क

कंपनी के एग्रीमेंट में घरों से कूड़ा उठाने के शुल्क भी निर्धारित हैं। 100 वर्ग गज तक के मकानों से 20 रुपये, 200 वर्ग गज के मकानों से 40 रुपये, 200 से 400 वर्ग गज के 50 रुपये, 400 वर्ग गज के हॉस्टल से 100 रुपये, 200 वर्ग फीट तक की दुकानों से 25 रुपये, 200 वर्ग फीट में बने रेस्टोरेंट,  ढाबा, फैक्ट्री शॉप, अनाज मार्केट, सब्जी मार्केट से 100 रुपये, 50 बिस्तर के क्लीनिक, हॉस्पीटल और नर्सिंग होम से 1500 रुपये, 50 से 100 बिस्तर के हॉस्पीटल से 3000 रुपये, 100 से ज्यादा बिस्तर वाले अस्पताल से 5000 रुपये मासिक शुल्क वसूला जा सकता है। इसके अलावा शॉपिंग कॉम्पलैक्स, मॉल  और सिनेमा हॉल से 50 पैसे प्रति वर्ग फुट, फैक्ट्री या मील से 50 पैसे प्रति वर्ग मीटर, बैंक, ऑडिटोरियम और 10 रूम के गेस्ट हाउस से 500 रुपये मासिक वसूल सकते हैं।

शुल्क की आड़ में अवैध वसूली

ठेका देने के बाद कुछ समय तक तो घरों से मुफ्त में कूड़ा उठाने की बात तय थी। निश्चित समय के बाद घरों से कूड़ा उठाने के बदले में सरकार द्वारा घरों और व्यवसायिक संस्थानों के लिए अलग अलग रेट तय किये गए थे। एनआइटी विधानसभा क्षेत्र की कालोनियों में स्थित प्रत्येक घर से कूड़ा इक्ट्ठा करने के बदले में 30 रुपये प्रति घर मासिक शुल्क कंपनी द्वारा वसूला जा रहा था। कंपनी से हुए एग्रीमेंट के मुताबिक इस दर को कंपनी नहीं बढ़ा सकती। लेकिन इसके बावजूद कंपनी ने नियमों को ताक पर रखकर घरों से 50 रुपये मासिक शुल्क वसूलना शुरू कर दिया है। कंपनी इससे पहले भी मनमानी कर रही थी। एक मकान से एक ही शुल्क लिया जा सकता है। लेकिन कंपनी एक ही घर में रहने वाले परिवारों से अलग अलग शुल्क ले रही है।

पर्यावरण को पहुंचा रहे नुकसान

नगर लोगों को गीला और सूखा कूड़ा अलग अलग डालने के लिए प्रेरित करता हैं। लेकिन दोनों तरह का कूड़ा एक ही साथ गाड़ियों में भरते देखा जा सकता हैं। शुरूआत में कंपनी को सौंपी गाड़ियों में गीला और सूखा कूड़ा डालने के अलग बॉक्स थे। लेकिन कंपनी ने गाड़ियों से पार्टीशन हटा दिया था।जिससे सूखा और गीला कूड़ा इक्ट्ठा हो कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। कूड़ा इक्ट्ठा करके अवैध डंपिंग पॉइंटों में डाला जाता है। जहां कंपनी द्वारा काम की चीजे छांटने के लिए कूड़ा कई दिनों तक रखा जाता है। इस दौरान कूड़ा सड़ने से दुर्गंध फैलती है और रसायन रिस कर जमीन को जहरीला बनाता रहता है। शहर में कंपनी द्वारा बनाए गए अवैध डंपिंग पॉइंट जगह जगह देखे जा सकते हैं। ऐसे में गंदगी घुलकर हवा को भी प्रदूषित करने का काम कर रही है।

शुल्क बढ़ाने का नहीं है अधिकार

सामाजिक कार्यकर्ता रविंद्र चावला का कहना है कि सरकार और ईकोग्रीन के बीच हुए एग्रीमेंट के मुताबिक कंपनी घरों अथवा व्यवसायिक संस्थानों से कूड़ा उठाने के बदले मेंले रहे शुल्क की दर नहीं बढ़ा सकती है। कंपनी द्वारा शुल्क को बढ़ाना पूरी तरह गैर कानूनी है। वहीं दूसरी तरफ कंपनी की लापरवाही के कारण पर्यावरण को लगातार नुकसान भी हो रहा है।

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