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हमने ही विवाह को नाच-गाने खाने-पीने का अवसर बना दिया

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पिछले हफ्ते सुप्रीमकोर्ट ने तलाक के एक मामले में बड़ी दिलचस्प टिप्पणी की। सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि शादी सिर्फ नाचना-गाना और खाना-पीना नहीं होता है। तो फिर क्या है? जब शादी दो वयस्क (स्त्री और पुरुष) को एक साथ रहने, एक ही रसोई का खाना खाने, यौन संबंध बनाने और बच्चे पैदा करने की सामाजिक और विधिक मान्यता देने की प्रक्रिया है, तो फिर विवाह के समय इतने लोगों का जमावड़ा क्यों किया जाता है? क्या शादी दो चार लोगों की उपस्थिति में नहीं हो सकती? हो सकती है। कोर्ट-कचेहरी, पुलिस थाने या मंदिरों में हुई शादी भी तो चंद लोगों की उपस्थिति में होती है। विवाह के समय सौ, दो सौ, चार सौ लोगों को जमा करने का क्या तुक है? हमारे धर्मग्रंथों में तो आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार तो विवाह की प्रक्रिया काफी सरल थी।

हम एक बार फिर उन पद्धतियों को क्यों नहीं अपना लेते हैं। विवाह लड़का हो या लड़की, उसके जीवन का महत्वपूर्ण अवसर होता है। यदि यह जितना सहज और सरल होगा, नवदंपति को आपसी सामंजस्य बैठाने में उतनी ही आसानी होगी। किसी भी समाज में विवाह जैसी संस्था कितनी सफल है, उसका पता उस समाज में होने वाले तलाक के मामलों से पता चलता है। विवाह को आज इतना बोझिल और खर्चीला बना दिया गया है कि लड़की के परिवार वालों का दम निकल जाता है। यही वजह है कि मध्यम आयवर्ग में लड़की का जन्म होते ही परिजन दुखी हो उठते हैं। उन्हें अपनी नवजात कन्या से कोई परेशानी नहीं होती है। उन्हें अपनी क्षमता भर उसे पढ़ाने-लिखाने, पालने पोसने में भी कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वयस्क होने पर उसके विवाह पर खर्च होने वाली भारी-भरकम रकम से दिक्कत है।

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ससुराल वालों को संतुष्ट न कर पाने पर उसके साथ होने वाले व्यवहार या दहेज न लाने पर मार देने से परेशानी है। और फिर शादी बचाने की सारी जिम्मेदारी भी उस कन्या पर ही डाल दी जाती है। यौन शुचिता के नाम पर ऐसे-ऐसे तर्क गढ़े जाते हैं कि लड़की वैसे ही परेशान हो जाए। प्राचीन पद्धति से विवाह करना कितना आसान था, यह धर्मग्रंथों का अध्ययन करने से ही पता चल जाता है। वर्तमान परिस्थितियों ने वैसे भी इंसानों के सामने इतनी कठिनाइयां खड़ी कर दी हैं कि उसे अपना जीवन यापन करने में ही नानी याद आ रही है।

कभी नौकरी की दिक्कत, तो कभी हारी-बीमारी, कभी कुछ तो कभी कुछ। ऐसी दशा में यदि विवाह जैसी संस्था भी जटिलताओं से घिर जाएगी, तो क्या होगा? हमें विवाह जैसी संस्था से जुड़े मिथकों का मोह खत्म करना होगा। ब्रह्म विवाह, आर्ष विवाह, प्रजापत्य विवाह या गंधर्व विवाह जैसे प्राचीन विवाह पद्धतियों को पुनर्जीवित करना होगा ताकि एक पुरोहित और लड़का-लड़की के परिजनों की उपस्थिति में बिना किसी तामझाम के विवाह संपन्न हो जाए। और यदि किसी कारणवश एक दूसरे के साथ दांपत्य जीवन की संभावना खत्म हो जाए, तो एक दूसरे से अलग होने की प्रक्रिया भी विवाह की ही तरह सरल होनी चाहिए।

Sanjay Maggu

-संजय मग्गू

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