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सूदखोरों के मकड़जाल में फंसकर कब तक जान गंवाते रहेंगे लोग?

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मुंशी प्रेमचंद की एक कालजयी रचना है सवा सेर गेहूं। कहानी सूदखोर महाजन की लुटेरी व्यवस्था का बड़ा मार्मिक वर्णन करती है। कहानी का पात्र शंकर अपने घर में साधु के आने पर सवा सेर गेहूं गांव के पुरोहित से मांगकर लाता है। वह सवा सेर गेहूं सात साल बाद पांच मन हो जाते हैं जिनका रुपया बनता है साठ रुपये। कुछ साल बाद साठ रुपये की रकम एक सौ बीस रुपये हो जाती है और इस एक सौ बीस रुपये का ब्याज चुकाने में शंकर की पूरी जिंदगी गुजर जाती है। उसके मरने के बाद उसका बेटा आजीवन मजदूरी करता है। हमारे देश के हिंदी पट्टी में सदियों से सूदखोरी की व्यवस्था चली आ रही थी। सरकारों ने बाद में सूदखोरी पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन इस सूदखोरी का दंश भोगने के लिए आज भी कुछ लोग मजबूर हैं। फरीदाबाद में सूदखोरों के तकादे से मजबूर होकर शनिवार को एक परिवार के छह सदस्यों ने अपने हाथ की नसें काट लीं।

कुछ ने नींद की गोलियां खाकर जान देने का प्रयास किया। इस घटना में घी व्यापारी की मौत हो गई, बाकी लोग अस्पताल में हैं। इस प्रकरण में परिवार ने नोएडा में मोबाइल एसेसरीज की कंपनी खोलने के लिए बाजार से 40 करोड़ रुपये उठाए थे। कंपनी नहीं चली, घाटा हुआ तो उधार और ब्याज चुकाने में दिक्कत होने लगी। सूदखोर तंग करने लगे। रकम भी करोड़ों में थी। स्वाभाविक है कि सूदखोरों ने ब्याज भी तगड़ी लगाई होगी। सवाल यह है कि जिन्होंने करोड़ों रुपये दिए हैं, वे अपनी रकम तो ऐसे नहीं छोड़ देंगे। यदि पीड़ित परिवार ने सरकारी या निजी बैंक से इतनी बड़ी रकम उधार ली होती, तो वे शायद कोई मानवीय तरीका अपनाते, अपनी रकम वसूलने के लिए।

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हो सकता है कि वे एक नया लोन दे देते, व्यापार को चलाने के लिए। जिस तरह महाजन या सूदखोर गुंडों को घर भेजकर हत्या करने, परिवार के सदस्यों को उठा लेने धमकियां देते हैं, वैसा सरकारी या निजी बैंक नहीं करते हैं। वे लिए गए रकम के बदले कानूनी तरीके से मकान की नीलामी करवा देते, जो भी अचल संपत्ति होती, उसको जायज तरीके से बिकवा कर अपनी रकम वसूल लेते। ब्याज भी जायज लेते। सरकार और बैंकों द्वारा लोन लेने वालों को तमाम तरह की सहूलियत देने के बावजूद लोग महाजनों की गिरफ्त में फंस रहे हैं। इसके पीछे कारण यही माना जा सकता है कि एक तो उन्हें फटाफट कर्ज मिल जाता है और उन्हें कागज का झंझट भी नहीं झेलना पड़ता है। लेकिन इतनी सी सहूलियत के लिए जो भुगतान करना पड़ता है, वह बहुत अधिक पीड़ादायक होता है। बार-बार दी जाने वाली धमकियों की वजह से जो तनाव पैदा होता है, उससे लोग अवसाद में चले जाते हैं। अवसादग्रस्त मनुष्य कई बार ऐसे कदम उठा लेता है जो कतई उचित नहीं होता। जैसा फरीदाबाद के इस परिवार ने किया।

Sanjay Maggu

-संजय मग्गू

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