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हमें तय करना होगा न्याय का राज चाहिए या कानून का?

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पिछले कुछ सालों से एक सवाल बड़ी शिद्दत से उभर कर सामने आ रहा है कि हम क्या चाहते हैं? न्याय का राज अथवा कानून का राज? उत्तर प्रदेश में जिस तरह से पिछले कई सालों से अपराधियों का इनकाउंटर हो रहे हैं, उसको देखते हुए यह सवाल उठना लाजिमी है। बीते मंगलवार की देर रात को बदांयु में दो बच्चों की हत्या के आरोपी का इनकाउंटर इन दिनों चर्चा में है। दोनों बच्चों के पिता ने कहा कि हत्यारोपी का इनकाउंटर नहीं होना चाहिए था ताकि कम से कम यह तो पता चलता कि उसने मेरे बच्चों को क्यों मारा। उत्तर प्रदेश सहित देश के लगभग सभी राज्यों में अपराधी मुठभेड़ में मारे जाते हैं। इन अपराधियों की मौत पर कुछ लोग जश्न भी मनाते हैं। जैसा कि साजिद की मौत पर कुछ लोगों ने पटाखे फोड़े, नाच-गाकर खुशियां मनाई। ऐसा क्यों होता है कि जब भी समाज में किसी अपराधी या खल पुरुष या नारी की हत्या या मौत होती है, तो लोग खुशियां मनाते हैं। तो क्या यह माना जाए कि हिंसा हमारे समाज के मूल में है?

क्या इस हिंसा को हमारा समाज बहुत सहजता से लेता है? शायद सच यही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है महिलाओं, आदिवासियों और दलित जातियों को लेकर दी जाने वाली गालियां। गालियां सदियों से दी जा रही हैं। महिलाओं के निजी अंगों, संबंधों और जातियों को आधार बनाकर दी जाने वाली गालियां भी एक तरह की हिंसा ही है। कई राज्यों में अपराधी के घर को नेस्तनाबूत करने के लिए बुलडोजर चलाना, इनकाउंटर करना क्या समाज के हित में है? इस सवाल का जवाब हमें खोजना ही होगा। क्या चाहिए न्याय का राज या कानून का राज। किसी अपराधी को मुठभेड़ के नाम पर मौत के घाट उतार देना, उसका घर बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर देना, कानून का राज स्थापित करना है। यदि पुलिस ही त्वरित न्याय करने लगेगी, तो फिर न्यायपालिका की जरूरत ही क्या रह जाएगी? अपराधी को पकड़कर उसे न्यायिक प्रक्रिया का पालन करते हुए न्याय दिलाना ही न्याय का राज कहलाता है।

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न्याय के राज में किसी के साथ अन्याय होने की गुंजाइश बहुत कम रहती है। कई बार हो सकता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति चूक कर जाए और निर्दोष को सजा मिल जाए, लेकिन ऐसा बिरले ही होता है। कानून के राज में तानाशाही की बू आती है। यदि पुलिस का अधिकारी निरंकुश हो जाए और कानून स्थापित करने की आड़ में वह हत्याएं करने लगे, नेताओं के इशारे पर हर किसी का घर गिराने लगे, तो क्या होगा?

प्रथम दृष्टया जो अपराधी लग रहा है, उसकी मुठभेड़ में मौत हो गई या उसका बुलडोजर चलाकर घर गिरा दिया गया, कल वह निर्दोष साबित हो, तब? तब क्या सरकार या पुलिस उसका घर बनवाकर देगी? इस दौरान उसके परिवार वालों को प्रताड़ना झेलनी पड़ी होगी, उसकी भरपाई कैसे होगी? यह हमें ही तय करना होगा कि हमें कैसा समाज चाहिए। हमें यकीनन न्याय का राज चाहिए जिसमें सबको न्यायपालिका पर विश्वास हो। अपराधी की मौत पर जश्न इसलिए मनाया जाता है क्योंकि लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास कम होता जा रहा है।

Sanjay Maggu

-संजय मग्गू

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